Home » National » modi trump meet historic as india begins crude oil purchase

modi trump meet historic as india begins crude oil purchase

[ad_1]

भारत अभी तक अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर था. जी-20 और उससे पहले अमेरिका यात्रा के दौरान ट्रंप मोदी मुलाकात में एक नई शुरुआत हुई है. इतिहास में पहली बार भारत ने अमेरिका से कच्चा तेल खरीदना शुरू किया है. सिर्फ भारत ही नहीं उससे पहले चीन, कोरिया जैसे देश अब खाड़ी देशों से अलग हटकर कच्चे तेल की खरीद अमेरिका से कर रहे हैं.

अमेरिका में गैरकानूनी काम था कच्चे तेल को बेचना

अब से दो साल पहले अमेरिका में यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि कोई देश कच्चे तेल की सप्लाई अमेरिका से लेगा. लेकिन अब कच्चे तेल से भरे टैंकर अमेरिकी पोर्ट से निकलकर दर्जनों एशियाई देशों के तट पर पहुंच रहे हैं. बीते तीन साल से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, तेल कंपनियों के दिवालिया होने और सेक्टर में बढ़ती बेरोजगारी के चलते अमेरिका ने अपनी तेल कंपनियों को बेचने की मंजूरी दे दी है.

ओबामा सरकार ने दी मंजूरी

गौरतलब है कि बीते 40 साल से अमेरिका में किसी देश को कच्चा तेल बेचने पर पाबंदी लगी हुई थी. सिवाए कनाडा के अमेरिकी तेल कंपनियां दुनिया के किसी देश को कच्चा तेल नहीं बेच सकती थीं. लेकिन 2015 में कच्चे तेल की कीमतों में दर्ज हुई बड़ी गिरावट के बाद तेल कंपनियों को बचाने के लिए अमेरिका में बराक ओबामा प्रशासन ने इस प्रतिबंध को कमजोर करते हुए एशियाई देशों को तेल बेचने की इजाजत दे दी थी.

अमेरिका से भारत के लिए तेल के टैंकर रवाना

भारत कच्चे तेल का दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा खरीदार देश है और यह खरीद अभीतक वह खाड़ी देशों से किया करता था. लेकिन हाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हुई मुलाकात के बाद पहली बार भारत ने अमेरिका से कच्चे तेल की खरीद की है. भारतीय कंपनी इंडियन ऑयल ने अमेरिका की तेल कंपनी से पहली खेप कच्चे तेल की खरीद को पूरा कर लिया है और इस साल अक्टूबर तक कच्चे तेल से भरे टैंकर भारत के पोर्ट पर पहुंचना शुरू हो जाएगा.

एशिया को कच्चे तेल की सप्लाई हो रही मजबूत

साल 2015 में बराक ओबामा प्रशासन से मंजूरी मिलने के बाद अमेरिका का एशिया को कच्चा तेल निर्यात धीरे-धीरे बढ़ रहा था. लेकिन 2017 में अमेरिकी कंपनियों को लगभग एक दर्जन एशियाई देशों से कच्चे तेल का ऑर्डर मिलने लगा. मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक अमेरिकी कंपनियां अपने कुल प्रोडक्शन का लगभग 15 फीसदी कच्चा तेल एशियाई देशों को बेच रही हैं.

क्यों एशिया को बेचा जा रहा है अमेरिकी कच्चा तेल

2014 में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज होना शुरू हुई थी. इसके बाद 2015 तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 20 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई. इसके असर से दुनियाभर की तेल कंपनियों के लिए प्रोडक्शन घाटे का सौदा बनने लगा. इसका सीधा असर अमेरिकी ऑयल सेक्टर पर पड़ा और इस दौरान अकेले अमेरिका में ऑयल सेक्टर से 1 लाख से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए थे.

ओबामा की मजबूरी, ट्रंप का फायदा

लिहाजा, ऑयल सेक्टर पर आई इस मुसीबत से बचने के लिए जहां बराक ओबामा प्रशासन ने कच्चा तेल बेचने पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया वहीं नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के लिए यह फैसला बेहद अहम हो गया. ट्रंप प्रशासन की दलील है कि वह महज ग्लोबल डिमांड-सप्लाई को बनाए रखने के लिए ऑयल सेक्टर में निर्यात का सहारा ले रहा है. लेकिन सेक्टर के जानकारों का दावा है कि इससे एशिया की खाड़ी देशों पर कच्चे निर्भरता कम होगी और कच्चे तेल निर्यात में अमेरिकी भागीदारी में इजाफा होगा. वहीं इस निर्यात से अमेरिकी रेवेन्यू में होने वाला इजाफा डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका फर्स्ट कार्यक्रम के साथ-साथ नई नौकरियां पैदा करने में सहायत होगा.

 

 

[ad_2]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*